चंदा की चुदाई 3 (Chanda ki Chudai Part 3) (कहानी का नया मोड)

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Chanda Ki Chudai Part 2

अब चंदा की कहानी अब एक नया मोड़ लेती है। चंदा की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। उसके पिता, जो सरकारी नौकरी में थे, उनका अचानक तबादला हो गया – एक दूर के जिले में, जहाँ से घर चलाना मुश्किल था। और उसकी मां को भी पिता के साथ जाना पड़ा। और घरवालों ने फैसला किया कि चंदा को रातों-रात ही ननिहाल भेज दिया जाए, जो एक दूर के गाँव में था। वह गाँव उत्तर प्रदेश के बिहड़ इलाके में था – घने जंगलों से घिरा, जहाँ सड़कें कच्ची थीं, बिजली कम आती थी, और लोग कम ही रहते थे।

पहले वाले स्कूल वाले प्रसंग के बाद (जो अब पीछे छूट चुका है), रात का समय था, चंदा रेलगाड़ी से उतरकर एक पुरानी जीप में बैठी, जो गाँव की ओर जा रही थी। जीप का चालक एक बूढ़ा आदमी था, जो रेडियो पर पुराने गाने बजा रहा था, और साथ में दो-तीन और यात्री थे – एक किसान जो थका-हारा सो रहा था, और एक औरत जो अपनी बकरी को गोद में लिए बैठी थी। बाहर घना अंधेरा था, जंगल के पेड़ सड़क के किनारे झुक रहे थे, कभी-कभी लोमड़ियों की आँखें चमकती दिखतीं, और दूर से कुत्तों की भौंकने की आवाज आ रही थी। हवा में मिट्टी और जंगली फूलों की महक थी, और चंदा का दिल तेज धड़क रहा था – डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्सुकता से।
ननिहाल में चंदा के नाना-नानी, मामा मामी और उनका लड़का और एक लड़की रहते थे। लेकिन मामा मामी और उनके लड़के सूरत में रहते थे। यहां सिर्फ नाना नानी रहते थे। – नाना का नाम फूलस्वरूप था, उम्र सत्तर के पार, कमर झुकी हुई, लेकिन आँखों में अभी भी तेज। वह दिन में घर के छोटे-मोटे काम संभालते और शाम को चबूतरे पर बैठकर गाँव की बातें करते। नानी का नाम सुशीला था, उम्र साठ के आसपास, दुबली-पतली, लेकिन हाथ-पैर तेज, घर का सारा काम अकेले संभालतीं – चूल्हा, पानी, गोबर आदि। उनके साथ एक छोटा सा कमरा था, जहाँ चंदा को जगह मिली। नाना-नानी चंदा को बहुत प्यार करते थे, लेकिन गाँव की रूढ़िवादी सोच के कारण उसे ज्यादा बाहर घूमने की छूट नहीं देते थे। नाना अक्सर कहते, "बिटिया, यहाँ बिहड़ है, रात में बाहर मत निकलना।" लेकिन चंदा का मन अब जाग चुका था।
उस पिछले प्रसंग के बाद चंदा बदल गई थी। वह अब बड़ी उम्र के पुरुषों की ओर आकर्षित होने लगी थी – उनके मजबूत हाथ, अनुभवी आँखें, और वह रूखा तरीका जो उन्हें अलग बनाता था। वह जानती थी कि यह गलत नहीं है, बस उसकी अपनी इच्छाएँ थीं, जो अब जाग चुकी थीं। गाँव पहुँचते-पहुँचते रात के ग्यारह बज चुके थे। ननिहाल एक पुराना घर था, ईंटों का बना, चारों ओर खेत फैले हुए। गाँव में कुल पचास-साठ घर थे, ज्यादातर किसान परिवार, दिन में खेतों में काम करते, रात में लालटेन जलाकर सोते। आसपास के इलाके में बिहड़ थे – सूखी नदियाँ, कंटीली झाड़ियाँ, और कभी-कभी जंगली जानवरों की अफवाहें। लोग सादा जीवन जीते थे, कोई बाजार नहीं, बस एक छोटी दुकान जहाँ चाय और बिस्कुट मिलते। चंदा को कमरा मिला ऊपर की मंजिल पर, जहाँ से खेत दिखते थे। वह रात ठीक से सो नहीं पाई, बाहर चाँद की रोशनी में खेत चमक रहे थे, और दूर से किसी की बाँसुरी की धुन आ रही थी।
अगली सुबह चंदा उठी, नहाई-धोई, और एक साधारण सलवार-कुर्ता पहन लिया – कुर्ता तंग था, जो उसके B00bs को उभारता था, और सलवार नीचे से थोड़ी ऊपर चढ़ी हुई। वह घर से निकली, गाँव घूमने। आसपास कुछ औरतें कुएँ से पानी भर रही थीं, बच्चे खेल रहे थे, और दूर के खेतों में किसान काम कर रहे थे। वह एक बड़े खेत की ओर चली गई – वह खेत सरसों का था, पीले फूलों से भरा, चारों ओर बाड़ लगी हुई, लेकिन कुछ जगह टूटी। हवा में सरसों की मीठी महक थी, और आसमान साफ नीला। खेत के बीच में एक झोपड़ी थी, जहाँ किसान आराम करते। वहाँ काम कर रहा था मोन सिंह – एक गरीब मजदूर, उम्र करीब पैंतालीस-पचास साल, काला-कलूटा, मजबूत कद-काठी, लेकिन गरीबी से जूझता। उसके कपड़े फटे-पुराने थे – एक पुरानी धोती और बनियान, जो पसीने से भीगे थे। वह खेत में गेहूँ की बुवाई कर रहा था, झुककर बीज डाल रहा था, उसकी पीठ पर पसीना चमक रहा था। चंदा दूर से देख रही थी, और तभी उसकी नजर मोन सिंह की फटी हुई धोती पर पड़ी – काम करते वक्त धोती थोड़ी सरक गई थी, और उसके L@nd का आकार साफ दिख रहा था। वह बड़ा था, मोटा और लंबा, जैसे कोई मोटी जड़ वाली सब्जी, जो धोती के फटे हिस्से से झांक रहा था। मोन सिंह को पता नहीं था, वह बस काम में लगा था, उसके हाथ मिट्टी से सने, और चेहरा थकान से भरा लेकिन मजबूत। आसपास कोई नहीं था – सिर्फ दूर एक बैल गाड़ी पर कोई किसान जा रहा था, और पक्षी चहचहा रहे थे।
चंदा का मन मचल उठा। वह अब शर्माती नहीं थी, लेकिन अभी भी सावधान थी। वह धीरे-धीरे खेत की ओर बढ़ी, सरसों के पौधों के बीच से गुजरती हुई। उसके कदम हल्के थे, लेकिन दिल तेज धड़क रहा था। मोन सिंह ने सिर उठाया, उसे देखा – एक शहर वाली लड़की, गोरी-चिट्टी, भरे हुए जिस्म वाली। वह रुक गया, "कौन हो बिटिया? इधर क्या कर रही हो?" उसकी आवाज रूखी थी, लेकिन नरम। चंदा मुस्कुराई, करीब आ गई, और कहा, "अंकल जी, मैं नई आई हूँ गाँव में। पानी पिला दो, प्यास लगी है।" मोन सिंह ने अपनी पानी की बोतल दी। चंदा ने जानबूझकर उसे छुआ, उंगलियाँ उसकी उंगलियों पर फिसलीं। वह बोली, "आपका खेत कितना सुंदर है। अकेले काम करते हो?" मोन सिंह शर्मा गया, "हाँ बिटिया, मजदूरी है।" चंदा ने पानी पिया, बोतल वापस दी, और मुड़कर जाने लगी – लेकिन तभी खेत की मेड पर उसका पैर फिसला। मिट्टी गीली थी, सरसों के पौधे हिले, और चंदा सीधे मोन सिंह के ऊपर गिर पड़ी। दोनों जमीन पर गिरे, चंदा का शरीर मोन सिंह के ऊपर – उसके B00bs उसके सीने से दबे, जांघें उसकी जांघों से सटीं, और नीचे उसकी धोती सरक गई, L@nd चंदा की जांघ से टकरा रहा था।
मोन सिंह चौंक गया, "अरे बिटिया!" लेकिन उसके हाथ चंदा की कमर पर आ गए, सहारा देने के बहाने। चंदा की साँसें तेज, वह उठने की कोशिश में और सट गई – उनके हाथ एक-दूसरे के शरीर पर लगने लगे, सहलाने लगे। मोन सिंह का हाथ चंदा के B00bs पर फिसला, धीरे से दबाया – B00bs नरम लेकिन सख्त, जैसे पके फल। चंदा की आँखें बंद हो गईं, वह बोली नहीं, बस सट गई। फिर अचानक, जैसे कोई जादू, दोनों के होंठ मिल गए – एक गहरा चुम्बन। जीभें एक-दूसरे से खेलीं, गर्म साँसें मिश्रित, मोन सिंह का स्वाद नमकीन और मिट्टी वाला। उसके हाथ चंदा के कुर्ते के अंदर सरके, B00bs को सहलाया, ghundi को छुआ। चंदा का हाथ नीचे गया, लेकिन L@nd को सिर्फ बाहर से दबाया – ऊपर-ऊपर का काम: चुम्बन, B00bs को मसलना, जांघों को सहलाना। कोई गहराई में नहीं गया, बस सतह पर – लेकिन उत्साह इतना कि दोनों की साँसें रुक रही थीं। सरसों के फूल हिल रहे थे, हवा में उनकी गर्माहट फैल रही थी।
अचानक, दूर से आवाज आई – "ओए मोन सिंह! काम हो गया?" एक और किसान खेत की ओर आ रहा था, बैल गाड़ी की घंटी बज रही थी। दोनों चौंक गए। मोन सिंह ने चंदा को धक्का दिया, "भागो बिटिया! छुप जाओ! में तुम्हे रात को मिलूंगा" चंदा ने कपड़े ठीक किए, सरसों की झाड़ियों में छुपकर भागी, दिल तेज धड़कते हुए। मोन सिंह ने धोती ठीक की, उठा, और किसान से बात की जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन दोनों का मन अधूरा था – वह स्पर्श, वह चुम्बन, वह गर्माहट।
रात हुई। गाँव में अंधेरा छा गया, चाँद की रोशनी में खेत चमक रहे थे। चंदा का कमरा ऊपर था, लेकिन वह सो नहीं पा रही थी – शरीर में आग लगी हुई, अधूरी इच्छा। रात के करीब एक बजे, बाहर सरसराहट हुई। चंदा ने खिड़की से देखा – मोन सिंह था, छुपकर आया, आँखों में वही रूखी चमक। वह इशारा कर रहा था, "नीचे आओ।" चंदा का दिल उछल पड़ा। वह चुपके से नीचे उतरी – घरवालों को पता नहीं चला, सब सो रहे थे, बाहर कुत्ते भौंक रहे लेकिन दूर। मोन सिंह ने उसका हाथ पकड़ा, खेत की ओर ले गया, झोपड़ी में। दरवाजा बंद किया, अंदर एक छोटी लालटेन जला दी – हल्की पीली रोशनी में मोन सिंह का शरीर चमक रहा था, पसीने से गीला, मांसपेशियाँ तनी हुईं, धोती पहले से सरकी हुई। चंदा की साँसें तेज, वह बोली, "अंकल... दिन में अधूरा रह गया।" मोन सिंह मुस्कुराया, "आज पूरा कर लेंगे बिटिया।"
मोन सिंह ने चंदा को दीवार से सटाया, चुम्बन शुरू किया – गहरा, जीभें घुमतीं, होंठ काटते हुए। उसके हाथ चंदा के कुर्ते में घुसे, B00bs को दबाया – नरम मांस, ghundi सख्त हो गई, जैसे कोई छोटी कली खिल रही हो। चंदा की सिसकारी निकली, "आह अंकल... चूसो।" मोन सिंह ने कुर्ता उतारा, B00bs को मुंह में लिया – एक-एक करके चूसा, जीभ से ghundi पर घुमाया, हल्के से काटा। हर चूसने में चंदा का शरीर सिहर उठता, जांघें गीली हो रही थीं। उसके हाथ रूखे थे, मिट्टी की महक वाले, लेकिन चंदा को वह स्पर्श जादू जैसा लग रहा था। चंदा ने मोन सिंह की बनियान उतारी, उसके सीने को चूमा – पसीने का स्वाद, मजबूत मांसपेशियाँ। फिर नीचे हाथ सरकाया, धोती खोली – L@nd पूरा बाहर, बड़ा, काला, सख्त, नसें उभरी, सिरा गीला। चंदा नीचे बैठी, उसे मुंह में लिया – धीरे से चूसा, जीभ से सिरा घुमाया, लार से चमकदार बनाया। मोन सिंह की आँखें बंद, हाथ चंदा के बालों में फंसे, "आह बिटिया... कितना अच्छा लग रहा है।"
फिर मोन सिंह ने चंदा को घास पर लिटाया। सलवार उतारी, ch00t दिखी – गुलाबी, नम, गर्म जैसे कोई गहरा कुंआ जिसमें पानी उबल रहा हो। मोन सिंह ने उंगली डाली – एक, फिर दो, अंदर-बाहर किया, संवेदनशील जगह को छुआ। चंदा कमर उठाती, "अंकल... अब डालो।" मोन सिंह ने L@nd ch00t के मुंह पर रखा, धीरे से धकेला – बड़ा था, चंदा को दर्द लेकिन मीठा, हर इंच में सनसनी। पूरा अंदर गया, मोन सिंह धक्के शुरू – धीरे, गहरा, फिर तेज। हर धक्के में चंदा की जांघें कांपतीं, B00bs उछलते, ghundi सख्त। झोपड़ी में गर्मी, पसीना टपकता, साँसें मिलीं, धड़कने की आवाजें गूंजतीं। बाहर रात शांत, जंगली जानवरों की दूर की आवाजें। चंदा ने पैर लपेटे, "तेज अंकल... और गहरा!" मोन सिंह ने गति बढ़ाई, हाथ B00bs को मसलते, ghundi को निचोड़ते। चंदा चिल्लाई, "आ रही हूँ!" दोनों साथ फूटे – मोन सिंह का गर्म पानी अंदर, चंदा का शरीर लहरों में कांपता, आनंद इतना तीव्र कि आँसू आ गए।
बाद में दोनों लेटे, मोन सिंह ने चंदा को सीने से लगाया। "बिटिया, यह राज रहेगा।" चंदा मुस्कुराई, "हाँ अंकल।" चंदा चुपके से घर लौटी। लेकिन दोनों अनजान थे कि गाँव का एक और आदमी वहाँ था – झाड़ियों में छुपा, उन्हें देख रहा था। उसका नाम था हरिया लाल – उम्र करीब पचास साल, पड़ोस का किसान, जो हमेशा रात में खेतों की रखवाली करता था। वह लंबा-तगड़ा था, दाढ़ी-मूंछ वाला, और गाँव में उसकी बात चलती थी कि वह चुपके-चुपके सबकी बातें सुनता और देखता रहता है। उस रात वह खेत में अपनी बैल को पानी पिलाने आया था, लेकिन झाड़ियों से चंदा और मोन सिंह की पूरी हरकत देख ली। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप देखता रहा, और मन ही मन सोचने लगा कि यह राज उसके काम आएगा। उसकी कहानी अगले भाग में...

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Chanda Ki Chudai Part 4